माँ

कितना मुशकिल है माँ होना।
एक अदृश्य बोझ को ढोना।
रोज सुबह जल्दी वो उठती है
उस घर के लिये मरती खपती है
जहां न उसके नाम की तख्ती है।
महान हम उसे ऐसे बनाते है।
मीठी बातों से लुभाते है
काम अपना बस निकलवाते है।
माँ को जब कुछ हो जाये तो
आँखो मे अंधेरा छा जाता है।
हाय कौन बनाये अब खाना
सवाल यही सब को खाता है।
सोचो तो जरा दिल से तुम
न बोझ बनो उस पर तुम।
उसको भी थोङा सुख दे दो।
कभी देर से उसे भी उठने दो।
दो एक प्याली चाय की उस को।
बाते दो पल उसके साथ करो।
देखना, इतने से ही वो रो देगी।
मन से हर शंका को धो देगी।

सुरिंदर कौर

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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