माँ

एक पल को भी जो मुझको नज़रों से ओझल होने न देती थी,
बचपन में जो मैं छुप जाता वो एक पल में ही रो देती थी,

ख़्वाबों की दुनियाँ में भी जब मैं डर कर सहम सा जाता था,
आकर सपनों में भी मेरा हाथ पकड़ वो लेती थी,

धुंधली धुंधली राहो में जब मैं धूमिल कभी हो जाता था,
अपने आँचल की छाया में लेकर मेरी वो उजली दुनियाँ कर देती थी,

छोटी छोटी चीजों को लेकर मैं रूठ कभी जो जाता था,
माँ खोल पल्लू में लिपटे सिक्कों से मेरे मन की कर देती थी॥

शकुन सक्सेना उर्फ़ राही अंजाना
काशीपुर उत्तराखण्ड

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 35

Like 7 Comment 37
Views 160

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing