माँ

एक पल को भी जो मुझको नज़रों से ओझल होने न देती थी,
बचपन में जो मैं छुप जाता वो एक पल में ही रो देती थी,

ख़्वाबों की दुनियाँ में भी जब मैं डर कर सहम सा जाता था,
आकर सपनों में भी मेरा हाथ पकड़ वो लेती थी,

धुंधली धुंधली राहो में जब मैं धूमिल कभी हो जाता था,
अपने आँचल की छाया में लेकर मेरी वो उजली दुनियाँ कर देती थी,

छोटी छोटी चीजों को लेकर मैं रूठ कभी जो जाता था,
माँ खोल पल्लू में लिपटे सिक्कों से मेरे मन की कर देती थी॥

शकुन सक्सेना उर्फ़ राही अंजाना
काशीपुर उत्तराखण्ड

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अध्यापक व कवि
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