कविता · Reading time: 1 minute

माँ

माँ के उदर से अमृत बरसे, उन से उत्तम व्यवहार करो।
चरणों में उनके शीश धरो, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

तुम पुष्प मनोहर उपवन के, महकाओ जगत प्रयास रहे।
जिस माँ ने जन्म-दुलार दिया, उस ममता में विश्वास रहे।
पग-पग पर जिसने स्नेह दिया,उस माँ पर नहीं प्रहार करो-
चरणों में उनके शीश धरों, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

गौरवांवित माँ के गर्भ गृह, से होकर गुजरा शरीर तेरा।
जो मुग्ध वधू बन आई थी, तेरे कारण गंभीर जरा।
सौन्दर्यमयी पुष्पित आंचल, अब उसका तुम विस्तार करो-
चरणों में उनके शीश धरो, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

उत्थान तुम्हारा होगा तब, जब नैतिकता का पाठ पढ़ो।
छलके न नैन से नीड़ कभी, शुभ सहज बताये राह बढ़ो।
यह शाश्वत है माँ की ममता, इसका मत उपसंहार करो-
चरणों में उनके शीश धरो, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

राजन राज्य कुसुमित रहेगा, जड़ चेतन सब फले श्रेष्ठ हो।
अस्तित्व नवल मिला जो तुम्हें, सर्व जीव जंतु में श्रेष्ठ हो।
कंचन कनक हृदय जिस माँ की, घृणित न दुर्रव्यवहार करो-
चरणों में उनके शीश धरो, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

कोमल हृदय है आँचल बड़ी, हे! माँ तुम बेरापार करो।
चरणों में उनके शीश धरो, तुम सत्य हृदय से प्यार करो॥

©-राजन-सिंह

7909047487

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