माँ

*माँ*
माँ जिसे भगवान से भी
बढ़कर मानते हैं हम,
माँ कितना पवित्र और पावन है ये शब्द,
वो कष्ट सभी सह लेती है,
पर संतान हो कष्ट नहीं होने देती,
अपनी ममता की छाँव कभी
कम न होने देती है,
वो बन कर गुरु जीवन का सार सिखाती है,
अपना कर्तव्य निभाती है,
हमें संवारते संवारते जब वो
खुद बूढ़ी हो जाती है,
तब हम क्यों उसको हम भूल जाते हैं,
जिंदगी में अपनी इतने व्यस्त हो जाते हैं,
की परवाह ही उसकी भूल जाते हैं,
उसे जब हमारी जरूरत होती है,
हम उसे तब वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं,
और वो “माँ” वहाँ पर भी सिर्फ
हमें दुआ ही देती हैं, हमारे लिए ही
खुशी की कामना करती है….
क्योंकि “माँ” होती है….!
सौरभ शर्मा
(दिल्ली)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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