माँ

लिखने चला तुझ पे कविता माँ
मन के मृदुल भावों को जगा,
बुद्धि, लेखनी दोनों हैं चुप
हृदय निरन्तर बोल रहा।।
प्रथम गुरु तुम, प्रथम प्रेयसी,
प्रथम ईश इस जीवन की,
तुम दाता इस तन औ प्राण की
मैं तो बस याचक ठहरा।।
तेरी दृष्टि से जग देखा,
संस्कारों से पहचाना,
रोष से तेरे बुरे को जाना
मन के सब पापों को हरा।।
क्या लिखूँ क्या तुझ पर बोलूँ
मैं ख़ुद ही सिरजन तेरा,
तेरे चरणों की रज पर माँ
नतमस्तक जीवन मेरा।।
दिनेश चंद्र पाठक “बशर”
संगीत अध्यापक
रा0इ0का0 लैंसडौन
जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखंड

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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