माँ

कड़ी धूप में, जाड़े में, बारीश में, कभी रुकती नहीं,
माँ की इबादत, है धरती –सी तू,
सारे जहाँ का बोझ उठाती हुई, संवेदनाओं में बहती-सी,
रसातल करती अपनों को, संस्कारों का सिंचन करती धरती –सी तू |
देखा है मैंने –
माँ, है पानी की तरह, हर रंग में अपना रंग मिला देती,
जहर में भी अमृत मिलाती, बारीश की बूदों में आँखों के पानी को सोखती,
कभी पल्लू में भिगोती …….छुपाती दर्द को, सहनशीलता की मूरत है,
माँ, है ईश्वर का रूप, परिवार को संभालती
सृजन करती नई सृष्टि, शक्ति है, चेतना है…
सच, अदभूत रचना है माँ
ईश्वर का पर्याय है माँ,
दौलत से भी ख़रीदा ना जाय, वह माँ का प्यार है,
हर इंसा का कर्ज है माँ का, चूका नहीं पायेगा कोई इसे,
माँ है तो सब कुछ है ……वरना ये दौलत व्यर्थ है
माँ सुकून की चद्दर है, जहाँ कल्पना ने रंगों से सजायी है दुनिया,
बेजोड़ तोहफा जिसके पास है, सबसे अमीर है वो दुनिया में..

डा.कल्पना गवली
वड़ोदरा, गुजरात|

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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