माँ

प्रथम प्रस्तुति .. आयोजन
विधा…छंदमुक्त

विषय ..माँ

क्या लिखूँ तुम्हे
शब्दों मे कहाँ समाहित
होगा तुम्हारा अस्तित्व
लफ्ज़ो मे नही बाँध पाऊँगी तुम्हे
एक दिन का रिश्ता कहाँ हम दोनों का
जो समर्पित करू तुम पर आज कविता
पल पल उन लम्हो की
कीमत जो गुजारे हमने आज तक
भला कहाँ मोल हो पाएगा
वह भी एक दिन मे
मोहताज भी नही हम
एक दिन के और जरूरी
भी नही की मै आज ही
तुम्हे लिख श्रद्धा सुमन अर्पित करू
जो बन्धन बंधा है हम दोनों
के बीच माँ,ताउम्र
और कई जन्मों का
कहाँ बांध पाएगा मुझे
और तुम्हे आज के
एक दिन मे और ना ही
मै समाहित हो पाऊँगी
और ना ही पूर्ण
इस खोखले रिवाजो मे
जो तय कर देते है एक दिन

और बांध देते है तुम्हारे वात्सल्य और ममत्व को
फिर ले लेते है एक विराम दुबारा जताने
के लिये फिर एक तारीख
और छलते रहते है एक दूजे को
इस विराम से उस अधूरे विराम तक
अब तुम्ही बताओ क्या लिखूँ
और कैसे लिखूँ माँ आज तुम्हे….स्वरा..सुरेखा

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मैं स्वरा मुझे शब्दों से दोस्ती हैं।जब मैं उदास होती हूँ तो हर्फो को पिरोती...
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