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माँ

बरवै छंद

तेरे दर्शन की माँ,आस लगाय।
जीती हूँ मैं दुनियाँ,लाख सताय
सगा नहीं है कोई , मात सिवाय।
सब जानती शारदे,लाख छिपाय।
लगे नैन भी थकने,करो न देर।
आओ माता चाहे,देर सवेर।
आकर मुझको ऐसा,दो वरदान।
निशदिन गाऊँ तेरे , ही गुणगान।
लोभ-मोह-क्रोध मात, दूर भगाय।
प्रेम भाव परमारथ, हृदय समाय।
चक्षु में ज्ञान भरे माँ,तमस मिटाय।
बच्चों पर माता नित, नेह लुटाय।
माता नित बच्चों के,कष्ट मिटाय।
ममता रूपी अमरत, सदा पिलाय।
लगती ठोकर तो माँ, हाथ बढ़ाय।
हाथ बढ़ाकर मुझको, गले लगाय।
मुश्किल दोराहे पर , राह दिखाय।
जीवन की नैया को, पार लगाय।
माता के चरणों में, शीश नवाय।
शीश नवाकर जीवन, सफल बनाय।

शकुन्तला अग्रवाल ‘शकुन’
भीलवाड़ा राज.

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Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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Shakuntala Agrwal
Shakuntala Agrwal
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