माँ

माँ से अस्तित्व हमारा ,माँ से ही जग में उजियारा
जीवन बगिया को संवारा ,अपना सबकुछ हम पे वारा

कोख से लेकर नन्हे कदमों तक सम्भाला
माँ तुम सा ना इस जग में कोई रखवाला
वह प्रथम स्पर्श व अद्धभुत है अनुभूति
निर्मल निश्चल छवि हमारे अन्तर्मन में सजी

मुख पे आए सिकन मात्र से हर दुविधा को जाना
हर डगर आई विपदा को तेरे आशीषों ने टाला
ममता रूपी सागर का प्यार लुटाया
जीवन की नैय्या को पार लगाया

तेरे आँचल की शीतल छाँव में पीड़ा बिसराई
जगत की नातेदारी मिथ्या हमे न रास आई
सृष्टि रचियता पालनहार कहलाई
दुर्गा से लेकर वसुधा हर इक रूप में समाई

व्याकुल हो मन जब प्यार तेरा ढाढ़स बंधाता
स्नेह तेरा अमिट निर्झर सम बहता जाता
गम के गहरे बादलों ने जब जब घेरा है
बन ज्योतिर्मयी जीवन उमंगो से उकेरा है

हम तेरे ऋणी सदा , चाहें कर दे सब न्योछावर
जीवन निर्माता प्रथम गुरू, माँ तुमसे है सारा संसार

नेहा
खैरथल , अलवर (राजस्थान)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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