माँ

।। माँ ।।

ऐ माँ तेरा एहतराम क्या होगा ,
तेरी गोद से बढ़कर मेरा मुकाम क्या होगा ।
कहते हैं माँ के पैरों मे जन्नत है ,
तो सोचो माँ के सिर का मुकाम क्या होगा ।।

पार कर लेती हूँ मुश्किलें सारी ,
सिर्फ नाम लेकर मैं उसका ।
सोचो गर हाथ थाम ले वो मेरा,
तो मुझे आराम क्या होगा ।।

मुमकिन है कि गलतियाँ होगी मुझसे ,
तुम कभी रूठ भी जाओ मुझसे।
प्यार से मना लेगें तुमको माँ ,
ये चेहरा फिर खिला- खिला होगा ।

देखा नही है रब को कभी मैने ,
‘हाँ वो है ,’ ये एहसास भी तेरा दिया हुआ है ।
गर सामना हुआ उस देव से मेरा ,
यकीनन वो चेहरा तुझसा ही होगा ।।

# पवित्रा – पवि #
पुणे, महाराष्ट्र

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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