माँ

रात दिन दुखियारी ,राह पथ चलती वो,
अंखिया बादल लिए, नीर बरसाती है।
कवन महतारी के, घर से निकाल फेके,
बेटा को भी शर्म हया,कभी नहीं आती है।
भूल गया बचपन, यादों के बारात लिए
माँ दुखिया पर दया, कभी नहीं आती है।
ममता की ममता को, बलि वह चढ़ा दिया
ममता के आंच में भी ,लाज नहीं आती है।।१।।

अपने खून-पसीनों, से सींचती सब वह,
स्वावलंबी बनने की, दुआ वह देती है।
स्वयं पेट काटकर ,भोजन खिलाती है वो,
खुद भूखी रहकर, जीवन नया देती है।
नव ग्रह नव माह,वह पेट पालकर
अनेकों कष्ट सहकर, नया काया देती है।
दुख का पहाड़ लिए, खुद सर पर वही,
नजरों से बचने का, काला टिका देती है।।२।।

रंजन कुमार प्रसाद

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मैं रंजन कुमार प्रसाद ,ग्राम-सकरी,पोस्ट-कुदरा, जिला-कैमूर बिहार का निवासी हूँ।मैं शिक्षक के पद पर माध्यमिक...
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