माँ

रात दिन दुखियारी ,राह पथ चलती वो,
अंखिया बादल लिए, नीर बरसाती है।
कवन महतारी के, घर से निकाल फेके,
बेटा को भी शर्म हया,कभी नहीं आती है।
भूल गया बचपन, यादों के बारात लिए
माँ दुखिया पर दया, कभी नहीं आती है।
ममता की ममता को, बलि वह चढ़ा दिया
ममता के आंच में भी ,लाज नहीं आती है।।१।।

अपने खून-पसीनों, से सींचती सब वह,
स्वावलंबी बनने की, दुआ वह देती है।
स्वयं पेट काटकर ,भोजन खिलाती है वो,
खुद भूखी रहकर, जीवन नया देती है।
नव ग्रह नव माह,वह पेट पालकर
अनेकों कष्ट सहकर, नया काया देती है।
दुख का पहाड़ लिए, खुद सर पर वही,
नजरों से बचने का, काला टिका देती है।।२।।

रंजन कुमार प्रसाद

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 93

Like 12 Comment 62
Views 497

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119