माँ

तुम हमको जहां में लायी हो माँ,
बच्चों को कितना भायी हो माँ।

जब भी कोई कष्ट है होता,
सबकी जबां पर माँ है होता।
दुनिया का कोई भी सुख हो,
बिन माँ के छणभंगुर होता।

तुम इतना हमको दुलराई हो माँ,
तुम हमको इस जहाँ में . . . . . . .

इक रोटी तुम कम ही खातीं,
पर हमको भर पेट खिलातीं।
जग सोता पर तुम ना सोतीं
जब तक हमको नहीं सुलातीं।

तुम्हीं तो ये जहाँ दिखलाई हो माँ।
तुम हमको . . . . . .

मोल नहीं कोई ममता का,
थाह नहीं तेरी क्षमता का।
संकट में तुम हरदम आतीं,
रुप धरे संकट हरता का।

संकट में तुम्हीं दोहाई हो माँ।
तुम हमको . . . . . . . . . . .

– अमरेश गौतम
रीवा,मध्यप्रदेश।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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