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माँ

“माँ “
कण-कण में निर्झर माधुर्य मिश्री घोलती ,
माँ शाश्वत प्रेम की सृजनहार होती ।
करुणा का सागर विशाल हृदय में रखती ,
माँ तेरे उपकारों की व्याख्या नही होती ।
मुसीबतों के समन्दर से साहिल पर लाती ,
माँ हमें जीने के सही मायने सिखाती ।
ममता भरे आँचल में हमे छिपा लेती ,
माँ सारे गम सहकर भी मुस्कुरा लेती ।
लबों पे जिसके दुआएं है सजती ,
माँ ही है जो हमसे कभी खफ़ा नही होती ।
अदम्य साहस की पताका फहराकर ,
माँ होने नही देती अत्याचार हम पर ।
पढ़ लेती हमारे चहरे से हर जज़्बात ,
माँ तेरे ही दम से तो रौशन है क़ायनात ।
ईश्वर का दिया हुआ अनमोल उपहार ,
माँ तेरे कदमों में है जन्नत का द्वार ।
त्याग,तपस्या की मूरत संस्कारों की सीता ,
माँ निष्ठा,सहनशीलता की रामायण व गीता ।
अल्फाज़ो में कैसे बयां हो माँ का गुणगान ,
माँ तो धरा पर है सब रत्नों की खान ।
सीता देवी राठी
कूचबिहार
पश्चिम बंगाल

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Pradip Rathi
Pradip Rathi
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