माँ

माँ चन्द्रबदनी मुझे नाराज दिखाई देती है,
मेरे सपनों में भी आज दिखाई देती है ।
वो इंसान के खातिर मग्न दिखाई देती है ,
देखो तो इंसानियत नग्न दिखाई देती है ॥1॥

किसी को माँ की ममता में दोष दिखाई देता है ,
किसी को माँ ममता का कोष दिखाई देता है।
किसी को माँ के प्रति रोष दिखाई देता है ,
किसी को माँ के रहते होश दिखाई देता है ॥2॥

माँ के सपने दिनरात कभी भी हो सकते है,
माँ के रहते हम कभी नही थकते है ।
माँ ही तो संसार मे जीवन की दाता है,
सब रिश्तों से बढकर माँ से नाता है ॥3॥

जग जगकर मुझको दूध पिलाया जाता था,
थपकी देकर बारम्बार मुझे सुलाया जाता था ।
वो खाये न खाये पर मुझे खिलाया जाता था,
एक मैं जो अपनी जिद पर चिल्लाया जाता था ॥4॥

ऋणी हूँ माँ का जिसने मुझको जाया था ,
बचपन में अपने हाथों से मुझे खिलाया था।
आंगन में छोडा माँ को आधुनिकता की राहों में,
आज गले मिलने की तडप है उसकी बाहों में॥5॥

स्वरचित-

रामचन्द्र ममगाँई “पंकज”
देवभूमि हरिद्वार उत्तराखण्ड

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 51

Like 11 Comment 76
Views 224

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share