23.7k Members 50k Posts

माँ

तुझे खो कर ही जाना तेरी छत्र-छाया में
ज़िन्दगी कितनी महफूज़ थी
न परवाह थी ज़माने की
ज़िन्दगी ग़मों से मीलों दूर थी

कोई नहीं है जिसे मैं, दिल का हाल सुनाऊँ
फ़ुर्सत ही नहीं किसी को, जिसे दर्द अपना बताऊँ
तन्हाइयों में घिर कर ‘ माँ ‘, तुझे आवाज़ लगाऊं
बेगानों की दुनिया में, जाऊं तो कहाँ जाऊं

‘ माँ ‘ के रिश्ते से बड़ी
कोई चीज़ नहीं होती है ज़माने में
अहसास होता है खुद
रिश्ते से जुड़ जाने में

तुझे खोये हुए बरसों हो गये
लगता है कल की ही बात है
ख़ुशी हो या ग़म दिल में
लगता है ‘ माँ ‘, हर वक़्त मेरे साथ है

डॉ. अलका गोयल
दिल्ली

This is a competition entry.
Votes received: 75
Voting for this competition is over.
10 Likes · 39 Comments · 624 Views
Dr. ALKA GOYAL
Dr. ALKA GOYAL
Delhi
2 Posts · 746 Views
मेरी स्वरचित मूल रचनाओं के 2 काव्य संग्रह - ' एक साल तेरह दिन '...
You may also like: