माँ

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इक नूर सा रोशन है चेहरें पर.,
ज़िंदगी के अंधेरों मे वो रोशनी सी है,
बंद पलकों में ही आ जाती है नजर मुझे,
बस यूँ आँखे बन्द करना , मेरी बंदगी सी है।
वक़्त की करवटो ने बदली है,चेहरे की रंगत जरा ,
पर आँखों मे चमक अब भी खुदा सी है। .
बेशक़ मीलों के हैं फ़ासलें दरम्यां मगर ,
हर पल मेरे इर्द-गिर्द उसकी महक सी है।
किसी दौर-ऐ -गर्दिश का मुझपे हुआ न असर कभी ,
हर लम्हा मेरे साथ चलती है जो,वो उसकी दुआ सी है।
मैं उसे ”माँ ” कहता हूँ ,
मेरे लिए वो ” ज़िंदगी ” सी है।
—- नितिन राठौर
इंदौर मध्य प्रदेश

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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