माँ

माँ

माँ की सेवा करना ही सबसे बड़ा पुण्य का काम है
इन्हीं के आचल तले ही अब शीतलता का छांव है
माँ के पास जो सुख भोगे कहीं नहीं मिल पाता है
यह कैसी मजबूरी इनको छोड़ दूर हम रहते हैं
आती है जब माँ की यादें आँसू झर-झर गिरते है॥

रोने का मन करता लेकिन दिल रोकर रह जाता है
अपना ही दिल अपने को यूं बार -बार समझाता है
कष्टों को झेलती होगी वो कैसे पिड़ा सहती होगी
सुनता हूँ कष्टों को जब आँखों से आँसू छलकते है
आती है जब माँ की यादें आँसू झर-झर गिरते है॥

स्नेहमयी आँखों से कैसे ममता को समझाती होगी
ना जाने कब किस हाल में घर पर वो बिताती होगी
दु:ख में भी खुश होती है जब पास मैं उसके जाता हूँ
वात्सल्य की बाढ़ में पल भर के लिए बहने लगते हैं
आती है जब माँ की यादें आँसू झर-झर गिरते हैं॥

@रमेश कुमार सिंह ‘रुद्र’@
(कान्हपुर कर्मनाशा कैमूर बिहार – 821105)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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