कविता · Reading time: 1 minute

माँ

गरीबी साथ थी जब तक तेरी ममता की छाया थी
वक्त बदला है अब मेरा तुझे दिल ढूंढता है माँ ।
न तन ढंकने को थे कपडे तेरा आंचल बना संबल
मिला है आज धन वैभव मगर बस तुम नही हो माँ ।
नहीं आती कोई आवाज खाली बर्तनों की अब
भरे भंडार रहते हैं मगर अब तुम नहीं हो माँ।
मेरे हाथों बची है बस तेरे सत्कर्म की दौलत
मिले जब भी कोई मौका लुटाता खूब हूँ सुन माँ ।
तुम्हारे पूजा घर में आज जब दीपक जलाता हूूँ
मुझे देवी की. प्रतिमा में नजर आती हो अक्सर माँ ।
थका हूूँ दौड कर अब माँ. ये लंबी जिंदगी की दौड़
तेरी गोदी में रख के सर मैं सोना चाहता हूँ माँ ।
चली आओ कभी तो तुम..जरा आ कर हमें देखो
हुआ हासिल सभी कुछ पर तुम्हारी ही कमी है माँ ।
रहा ज़िंदा हर इक रिश्ता “तनुज” अपनों में बेगाना
मगर अनमोल था रिश्ता वो केवल तुम नही हो माँ।
– सतीश मैथिल “तनुज” ( अहमदाबाद)

Competition entry: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता
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Author
शिक्षा - वाणिज्य स्नातक जन्मस्थली - आगरा ( उत्तर प्रदेश) सम्प्रति - स्वतंत्र लेखन ,देशभर के कई प्रतिष्ठित अखबारों में गजल, गीत, छंदमुक्त कविताएँ प्रकाशित होना। सम्मान - दिल्ली भाषा…
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