माँ

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जीवन की अरुणाई माँ है ,भीनी सी अमराई माँ है ,
त्याग तपस्या की मूरत सी,भावों की गहरायी माँ है |

ग्यान मयी गीता गंगा है ,जीवन धन माँ आनन्दा है ,
नरम सुखद सी हरी दूब वह, थकन मिटादे सुखकन्दा है |

माँ जीवन की एक क्यारी है ,सदा महकती की फुलवारी है ,
घने अभावों की दुनियाँ में ,सुख दुख की ज़िम्मेदारी है |

नहीं कोई माँ के जैसा है ,हर उपमा बेइमानी सी है ,
दुनियाँ की सारी दौलत भी ,माँ के आगे पानी सी है |

माँ फिर आज तिरस्कृत क्यूँ है इतनी आज उपेक्षित क्यूँ है |
मंजूषा भर गयी दर्द से ,संतति क्यूँ बौरायी सी है |
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माँ ! शब्दों से परे ,एहसास की भाषा है |
माँ ! माथे की सिलवट ,हर दर्द की दिलासा है |

माँ ! स्नेह की अविरल नदी ,निश्छल प्रेम की पराकाष्ठा है |
माँ ! दुख सुख में समरस ,सहनशीलता की परिभाषा है |

माँ ! बनावट से रहित ,जीवन की सत्यता है |
माँ ! छल कपट से परे,ईश्वर की उदारता है |

माँ ! संपूर्ण संसार ,जग की जीवनता है |
माँ ! स्नेह भरी छाँव ,सुख भरी वर्षा है |

माँ ! ही सर्वस्व ,माँ ही परमात्मा है |
कहता है ईश्वर भी ,माँ ही विधाता है |
मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’
लखनऊ (उत्तर प्रदेश )

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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