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माँ

माँ की डाँट पर जो फुटकर रोये थे
फिर माँ के आंचल में लिपट के सोये थे
चंदा मामा की लौरी के साथ माँ की थपकी
नींद में खो जाते थे लेते ही झपकी ।

जिसने खुद जागकर हमें सुलाया
दुनिया से खाकर ठोकर भी सिने से लगाया
खुद प्यासी मरती रही पर पानी हमें पिलाया
भूख से करवट बदलती रही
पर खाना हमें खिलाया ।

माँ के इस क़र्ज़ को इसतरह दुनिया निभाई
बीवी हुई अब अपनी माँ हुई पल में पराई
माँ के क़र्ज़ को किसकदर चूका पाओगे
लाख जन्म लेकर भी कर्ज़दार ही रह जाओगे ।

माँ के इस बलिदान पर जब भी मैंने कलम उठाई
हारा हुआ पाया खुद को कुछ समझ ना पाया
बड़ा बेरहम है ज़माना क्या इसे समझा पाओगे
क्या अमित माँ के इस क़र्ज़ और बलिदान को हक़ दिला पाओगे ।

This is a competition entry.

Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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Amit Mishra
Amit Mishra
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