माँ

माँ तो माँ होती है |
माँ की ममता अनमोल होती है |
जब हमारा अस्तित्व भी नहीं होती धरा में,
तब से वो हमें पहचानती है |
गर्भस्थ से ही हमें जानती है |
हमारा लात मारना ,तब से माँ को भाती है |
इसलिए तो हमें वो निस्वार्थ चाहती है |

माँ क्या होती है ? उनसे पूछो,
जिन्हें बचपन में ही वो छोड़ जाती है |
आजीवन ममत्व से वंचित,उस मन से पूछो !
कितनी ठोकरें, किस-किस मोड़ में खाती है ?
अनवरत यातनाएँ सहकर भी ,
वो हमें काबिल बनाती है |

खुद रहकर आलीशान भवन में,
नित्य हवाई सैर करते हैं |
माँ,को वृद्धाश्रम भेजकर,
किस जनम का बैर निकालते है ?
माँ, की निश्छल नैसर्गिक वात्सल्य देखो !
फिर भी,वो अपने संतानों के लिए,
तरक्की की ही माला जपती है |

–पवन कुमार मिश्र ‘अभिकर्ष ‘
बिशुनपुर,पीरटाँड़,गिरिडीह (झारखण्ड)

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 26

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like 7 Comment 56
Views 114

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share