Nov 11, 2018 · कविता

माँ

घर की दीवारों की नमी,
खिड़की दरवाजों का तुफानों मे जोर-जोर से टकराना,
पहले नही था ऐसा मंजर इस घर के आंगन का,

कितने वर्षों से क्यों अब कोई नहीं आता यहां,
दीवारों मे पडीं दरारों में झांकने,
दरवाजे खिडकियों की चटखनियों की मरम्मत कराने,

कितनी धूल जम गई है आंगन में लगे आइने पर,
जिसमें अब सब रिश्ते धुंधली सी तस्वीर बन गए,

छत पर रखे गमलों मे पौधों के अवशेष भी नही बचे हैं ,
जिन्हे मां सुबह -सुबह पानी से सिंचिती थी,
सींचा था जिन्होने हर एक रिश्तों को जो इस घर में पलता था

आज मां नहीं है तो सब रिश्ते भी सूख गये है
बची है तो मेरी आँखों मे नमी जो मैने इन दीवारों से ले ली,
जिसमें मेरी माँ की यादें बसी हुई है……

अजय सिंह राणा चंडीगढ़

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