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माँ

जब कभी रिश्तों की गुत्थियां
उलझ उलझ जाती हैं,
तो माँ जाने कब चुपके से पास चली आती है।
मेरे ख्यालों में उभरती है
एक पुरानी सी तस्वीर,
जिसमें ‘मेरी उम्र’की माँ बैठी नज़र आती है।
उधड़े रिश्तों को प्रेम से
सिलते हुए मेरी माँ,
फटे रिश्तों में क्षमा का,पैबंद लगाती है।
सारे रिश्तों को करीने से
सहेजे हुए, मेरी माँ
मेरी उलझन को दे सुलझन मुस्काती है।
मैं भी जुट जाती हूँ तभी
रिश्तों की तुरपाई में,
मेरी खोई हंसीहोंठों पे लौट आती है।
और माँ, जाने कब
चुपके से, धीरे से
मुझे नई राह दिखा,दूर चली जाती है।।
धीरजा शर्मा
चंडीगढ़

This is a competition entry.

Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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Dheerja Sharma
Dheerja Sharma
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