23.7k Members 49.8k Posts

माँ

किसमें सामर्थ्य है
‘माँ’ को परिभाषित/ परिमापित करने का,
सम्पूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममत्व और प्रेम
और क्या नहीं निहित है ‘माँ’ में,
फिर कौन है?
जो समेट सके ‘माँ’ को गढ़े शब्दों में,
‘माँ’ का नाम आते ही
ममत्व, देवत्व और असंख्य शब्द संसार,
कैनवास पर उतरने लगते हैं,
तैयार होने लगती है
एक अदभुत प्रेममयी आकृति
जिसने अपने असंख्य प्रेम रंगों को,
बेहिचक निकालकर,
मेरे निर्जन कैनवास में भरा होगा .
‘माँ’ ‘श्री’ भी है और प्रथम गुरु भी,
‘माँ’ के बताए शब्द आज भी वैसे ही याद हैं
लोरियों की गूंज आज भी रूह को सुकून देती है,
और यह ‘माँ’ है,
जो प्रतिपल अदृश्य परिपालक बन,
साथ बनी रहती है.
– डॉ. सूर्यनारायण पाण्डेय
लखनऊ.

This is a competition entry.

Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

Voting for this competition is over.

Votes received: 60

Like 11 Comment 57
Views 356

You must be logged in to post comments.

LoginCreate Account

Loading comments
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
डा. सूर्यनारायण पाण्डेय
लखनऊ
66 Posts · 3.3k Views
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 1000 से अधिक लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर'...