माँ

कोई बला जब हम पर आई ,माँ को खुद पर लेते देखा !
हुआ हादसा साथ हमारे ,माँ को बहुत तड़पते देखा !
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हो तकलीफ हमें न कोई ,साँझ-सवेरे खटते देखा !
कभी नहीं संकट के आगे ,हमनें माँ को झुकते देखा !
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ऊपर-नीचे अंदर-बाहर ,माँ को फिरकी बनते देखा !
नहीं आखिरी दिन तक हमने ,माँ को थककर सोते देखा !
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जब जब ठोकर खाई हमने ,माँ को हमें उठाते देखा !
माँ से बढ़कर इस सृष्टि में ,हमनें नहीं किसी को देखा !
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साँस थामकर हमने माँ को ,दूर बहुत है जाते देखा !
पूजे जाते भगवानों में ,माँ का रूप समाते देखा !

डॉ शिखा कौशिक ‘नूतन’
कांधला (शामली)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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