माँ

“माँ”
बहुत देर से माँ तुमको
मैं लिखना चाहूँ,
मगर क्या-क्या लिखूँ,
ये समझ न पाऊँ ।
कुछ शब्दों में माँ को बांधे,
ये कलम को मैं कैसे समझाऊँ ?

माँ जननी है, माँ गुरु है,
माँ ममता की शीतल छाया है,
माँ देवी है, माँ पूजा है,
माँ में संसार समाया है ।

मां बच्चों के खातिर जीती है,
जाने क्या-क्या वो सहती है,
हर दुःख सह कर हंसती है,
‘मैं खुश हूँ’ ये ही तो कहती है ।

माँ के क्रोध में भी दुलार है,
माँ की चिंता में भी प्यार है,
संतान माँ के लिए खुशी का भण्डार है,
पर माँ से ही तो श्रृष्टि या घर परिवार है ।
–पूनम झा
कोटा राजस्थान

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 66

Like 11 Comment 39
Views 539

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share
Sahityapedia Publishing