माँ

“माँ”
बहुत देर से माँ तुमको
मैं लिखना चाहूँ,
मगर क्या-क्या लिखूँ,
ये समझ न पाऊँ ।
कुछ शब्दों में माँ को बांधे,
ये कलम को मैं कैसे समझाऊँ ?

माँ जननी है, माँ गुरु है,
माँ ममता की शीतल छाया है,
माँ देवी है, माँ पूजा है,
माँ में संसार समाया है ।

मां बच्चों के खातिर जीती है,
जाने क्या-क्या वो सहती है,
हर दुःख सह कर हंसती है,
‘मैं खुश हूँ’ ये ही तो कहती है ।

माँ के क्रोध में भी दुलार है,
माँ की चिंता में भी प्यार है,
संतान माँ के लिए खुशी का भण्डार है,
पर माँ से ही तो श्रृष्टि या घर परिवार है ।
–पूनम झा
कोटा राजस्थान

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