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माँ

मेरे रोने पर जब आप मुस्कुराई थी,
मेरे आने की आहट तब आपने पाई थी ,
मेरे हर दर्द पर फिर आपकी आँखें डबडबाई थी ।
अपनी ममता की छाँव में
मेरी दुनिया आपने सजाई है ।
माँ के इस कर्ज़ की
ना कभी कोई भरपाई है ।
मेरे अवचेतन मन में माँ बस आप ही समाई है,
तभी तो हर पीड़ा में बस आप ही याद आई है ।
देखती हूँ जब भी कोई बुरा ख्वाब,
तो निकलता है ‘ओ माँ ‘ मुँह से अपने आप ।
आपके अँगना को छोड़ बीत गए कई दशक,
पर उस छाँव की आज भी है मन में एक कसक ।
मायके की आत्मा है माँ,
आतुर है मन जाने को वहाँ
क्योंकि रहती है वहाँ मेरी प्यारी माँ ।
हर थकान हर शिकन हो जाती है हवा,
रखती हूँ जब सिर आपकी गोद में मैं माँ ।
एक अनवरत प्यार का आपसे बहता है झरना,
है ईश्वर का वरदान माँ आप, और क्या कहना ।
—– कविता अग्रवाल,अजमेर

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Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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Kavita Agrawal
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