माँ

मुलाकात माँ से……
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दबा इक दर्द सीने में आँखों में अश्क समंदर ,
जहाँ वालों की नज़रों से छुपाया गम का इक मंज़र।

रखा सर गोद मे माँ की बाँध टूटा था पलकों का,
रोक पाईं न ये अँखियाँ बहा सैलाब अश्कों का।

बूढे कमज़ोर ओर लाचार हाथ रखे मेरे सर पर,
मैं हूँ मज़बूर बिटिया बस याद है अब खुदा का घर।

न जाने किस घड़ी आवाज़ देकर वो बुला लेगा,
रहना मजबूत तुम लाखों ही दुख तुमको जहाँ देगा।

लड़ी हो अब तलक जीवन से और इसकी चुनौति से,
न डरना बाद मेरे तुम हैं जो शाह बपौती से।

बनना तुम ढाल अपने दोनो इन मासूम बच्चों की,
ये भगवन सुनता है निश्चित दुःखी लाचार सच्चों की।

न घबराना तनिक भी और दुनिया को दिखा देना,
बना स्वावलंबी बच्चों को दुनिया को सिखा देना।

विमुख हों लाख परिस्थितियां छोड़ दें साथ सब तेरा,
थाम कर डोर ईश्वर की इसी विश्वाश में जीना।

ये जीवन पथ है पथरीला घायल है प्रतिक्षण मन,
तेरे सँग में कर्म तेरे भाग्य तो बस है एक दर्पन।

शशि रंजना शर्मा ‘गीत’ (फरीदाबाद)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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