माँ बस माँ ही नहीं

मां बस मां ही नहीं है,
मां वह है जो कोई नहीं है.

मां नौ माह तक गर्भ में ढोई
मां जन्म देते वक्त खुद रोई
मां स्तनपान से भूख मिटाई
मां उंगली पकड़कर चलना सिखाई
मां प्रथम ज्ञान की दीपक जलाई
मां बस मां ही नहीं है
मां वह है जो कोई नहीं है

मां वह जन्म दात्री है
जो दुनिया बसा सकती है
जो दुनिया चला सकती है
जो सपने दिखा सकती है
जो गिर कर संभलना सिखा सकती है
मां बस मां ही नहीं है
मां वह है जो कोई नहीं है

मां के बगैर कोई सुख नहीं है
मां जहां है सारा सुख वहीं है
मां बस मां ही नहीं है
मां वह है जो कोई नहीं है

कवि – जय लगन कुमार हैप्पी
बेतिया

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