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माँ

जो सोचता, वो बोलता,अपने सारे राज उनके सामने खोलता
कुछ सही, कुछ ग़लत, कुछ अच्छा, कुछ बुरा
बहुत कुछ झूठा, थोड़ा सच्चा
पर अब न कोई बात होगी, हर बात मेरे लिए राज होगी,
मन में उलझन रहेगी, हर बात मेरे लिए तोहमत होगी ।

चली गई माँ, छोड़ कर पिता के सहारे मुझे,
पता कहाँ था उसे भी हो जाएगी इतनी जल्दी जुदा मुझसे,
पता होता तो जीवन का दर्शन बताती, अच्छे बुरे का सही ज्ञान दे जाती ।

पर अब न कुछ हो सकता है,
मन सिर्फ और सिर्फ रो सकता है, अकेला होता हूँ ,
जब भी कभी , यादों में माँ की खो जाता हूँ |
मन अकेला है, सहारा खुद ही अपना हूँ । खुद के लिए अब एक सपना हूँ । खुद को समझाता हूँ , कब तक सहारे माँ के जीतता रहता जग, बनना है मजबूत सहारा पिता का अब ।
जाते-जाते भी सीख मुझे दे गई,
दुनिया है पापी बड़ी, तुझे कब तक संभालूं, यही एक तरीका था,
दिल में तेरे रहूं, पर पास रहे रब , नाम तेरा हो रोशन,
तब यहाँ बैठे भी मैं जीत लूंगी जग …

कवि
दीपक मेवाती वाल्मीकि
तावड़ू (मेवात) हरियाणा

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Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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