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माँ

निश्च्छल निर्मल सृजन शाश्वत,
चिर जीवन सम प्राण है।
मात! सर्जना अंतहीन है,
जगती सकल विधान है ।

देवी करुणा विश्व नियंता,
बृहद व्योम हितकारी माँ।
पुत्र मोह सी सच्ची मूरत,
क्षिति समग्र संचारी माँ।
कर सदैव आशीष निछावर,
अश्रु स्नेह सम्मान है।
विधि विधान को करे चुनौती,
ममता सजल महान है।।

गर्भ सतत माँ पुत्र सँवारे
नख-शिख अविरल नेह है वारे
जन्म सनातन धरणी धारे
नित नव पुत्र प्रभात निखारे
वेदों की माँ है परिभाषा
गीता का सम्मान है
मात! सर्जना अंतहीन है,
जगती सकल विधान है।।

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Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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ASHOK SINGH
ASHOK SINGH
Azamgarh
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मैं अशोक सिंह आज़मगढ़ का मूल निवासी हूँ शिक्षा में मैंने बी एस सी की...