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माँ

माँ ,हमारी सारी बलाएँ,
अपने सर लेती है ।
वो माँ है, सब कुछ ,
हम पर वार देती है ।
उसका कर्ज हम क्या चुकायेंगे !
इतना करें उसके लिये,
कि माँ जब बूढ़ी हो जाए,
उससे मीठा बोलें और
उसके लिये दिल में जगह रखेँ ,
थोड़ी घर में जगह रखेँ ।

रवि रंजन गोस्वामी
कोचीन

This is a competition entry.

Competition Name: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता

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रवि रंजन गोस्वामी
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