माँ

माँ है वरदान दृष्टि,नेह ममता बयारि,
माँ है गुरुश्रेष्ठ ,पाठ गर्भ से पढ़ाया है ।
सबला है माँ तो सारे प्राणियों की पूजनीय,
जन्म देव मुनि नर मांं से ही तो पाया है।।

लक्ष्मी सरस्वती दुर्गा का रूप है माँ,
माँ का यह स्वरूप सृष्टि चक्र मे समाया है।
खग मृग सृष्टि के असंख्य जीवधारियों ने,
मां की गोद को ही रूप स्वर्ग का बताया है।।

नवमास कष्ट मे सुखो की अनुभूति करे,
माँ का यह स्वरूप बृह्मरूप कहलाया है।
मानवीय मूल्य संस्कार आत्मसात करे,
शील सत्य ग्यान वात्सल्य ही पिलाया है।।

सुनि किलकारी शिशु मुख वृन्द देखि देखि,
संकल्प स्वप्न साकार कर दिखाया है।।
सहे भूख प्यास त्रस्त नीर नयनो के बीच,
किन्तु प्यार शिशु हेतु नित्य बरसाया है।।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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