माँ

माँ ही जन्नत माँ ही मन्नत
माँ में सब संसार
माँ की ममता को पहचानो
माँ ही है भगवान
न इसका तिरस्कार करो तुम
यह प्रकृति का वरदान
कष्ट सह कर के जीवन देती
प्रथम गुरु कहलाती माँ
माँ के आगे प्रभू भी शीश झुकाते
क्योंकि प्रभू से भी ऊंची है माँ
माँ के त्याग को कभी न भूलें
हर तकलीफों से लड़ जाती माँ
हो हम उससे नाराज़ भले ही
सब भुला गले लगा लेती है माँ
सृष्टि का अनमोल नगीना
होती है हम सबकी माँ
इतनी प्यारी होती है माँ
अनुराधा चौहान
कल्याण (महाराष्ट्र)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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