माँ

अन्तरतम की गहराई से
हृदय की सच्चाई से
संवेदना की अनुभूति से
वात्सल्य की प्रीति से
शृंगारती है माँ।

सुरमयी संगीत बनकर
शास्त्र-शस्त्रों में निपुणकर
हर बला-दुख दूर कर कर
प्रेम व आनंद भरकर
दुलारती है माँ।

जीवन में जीजिविषा
संबल व संघर्षिता
कर्मपथ पर निरन्तर
चलने की धर्मिता
संचारती है माँ।

संतति मेरी सुंदर होवे
मानव के उत्तम गुण ढोवे
चरित श्रेष्ठ हो मन हो निर्मल
जग में सबका प्यारा होवे
गुहारती है माँ।

दिवाकर राय , बेतिया।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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