माँ

कलेजे में दुःख-दर्द छिपाकर,
फूल-सी खिली रहती थी माँ
निवाला दे अपने मुख का मुझे,
स्वयं भूखी रहती थी माँ
स्वयं चाहे न मिला आशियाना,
सुरक्षा कवच बन मेरी
अच्छा खिला, सूखे में सुला,
खुद गीले में सोती रहती थी माँ।
गरीबी का कहर सहकर भी,
अच्छे दिन की आस में
मेरा बचपन रूपी फूल खिलाकर,
स्वयं उम्र में ढलती थी माँ।
असीम लडा कर लाड मेरे,
अरमान पूरे करती थी माँ
नयनों से टकटकी लगा,
मेरी कामयाबी की दुआ करती थी माँ
मेरे सफल जीवन का दीया,
जमाने की तेज हवा में जला दिया
मुझे ज़रा सी विपदा में देख,
आँख से झरने-सी झरती थी माँ।

परिचय:-
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा
सम्पर्क 9050978504
व्यवसाय-अध्यापन
ई मेल-neelam11052014@gmail. com

प्रमाणित करता हूँ कि यह मेरी स्वरचित मौलिक एवम अप्रकाशित रचना है।
अशोक कुमार ढोरिया

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