माँ

माँ

माँ का वर्णन करने को मैं
चाहे कितना भी करूँ प्रयास।
असमर्थ कर रहा हूँ अनुभव
शब्द नहीं हैं मेरे पास।।

माँ तो है एक त्याग की मूर्ति
वात्सल्यता की सिंधु अपार।
सन्तान का अहित उसको तो
बिल्कुल भी है नहीं स्वीकार।।

माँ जो करती है लालन पालन
वह तो है एक तप के समान।
अपने बच्चे की ख़ातिर वह
सब सहती है मान अपमान।।

ख़ुद न खाए चाहे वह भोजन
पेट सन्तान का भरती है।
बच्चे की बस एक मुस्कान पे
वह त्याग की देवी मरती है।।

सर्वाधिक पूज्यनीया है माँ
माँ से बड़े नहीं भगवान।
ढूंढ के देख लिया सब ओर
नहीं दूजा कोई माँ समान।।

✍️अवधेश कनौजिया
नई दिल्ली

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