कविता · Reading time: 1 minute

माँ…

ऊन
और सिलाइयों के बीच
अंगुलियां
बुन डालती थी
जुराबें सर्दियों के लिए,
टीवी पर
निरतन्तर देखते
धारावाहिक के बीच ही
देख लेती भी
जुराबों और पाँव का नाप,
नई पुरानी ऊन से
बुने जाते थे
स्वेटर रंग बिरंगे,
इन्ही बुनते उधड़ते
स्वेटरों जुराबों से ही
दी जाती थे
ढेरों नसीहतें,
रंग बिरंगी
जुराबे स्वेटरे
सुना डालती थी
समाज का रंग ढंग
रिश्तों नातों की मिठास
ये
उस समय की बात है
जब ज़िंदा थी माँ… ।

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