माँ

ममता की छाँव
जीवन की नाव
स्नेह की मूरत
प्यारी- सी सूरत
सिखाती है बुनना सपनों को वो
लगने ना देती कभी उनमें गांठ
उससे ही सीखा है मैंने
जीवन का पाठ ।
माँ है वो मेरी
माँ….. शब्द ही ऐसा है
सुनते ही जैसे
कानों में मिसरी- सी घुल जाती है
एक अनोखी- सी रचना है सृष्टि की
बहता है दिल में जिसके
प्रेम का अथाह सागर
लगाती हूँ जिसमे डुबकियाँ
गर हो कभी कोई गलती
देती है मीठी -सी झिड़की
छुपा लेती पल्लू में
आती जब कोई मुझपर आंच ।

शुभा मेहता
अहमदाबाद ,गुजरात

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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