Nov 2, 2018 · कविता
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माँ

तेरा रूप है मुझमे, मैं रहती हूँ तुझमें,
हर आह में तुझे बुलाऊँ, तेरी आँचल में, सुकुन की नींद सो जाऊँ,
माना कि कह देती हूँ तुझे झिझक के,
पर माँ, रोती भी तो हूँ, तुझे ही लिपट के,
मेरी एक आवाज़ में, तू सारा जहां दे जाती है,
हँसते हुए चेहरे में भी, तू मेरा गम ढूंढ जाती है,
धूप को भी, छांव बना देती है,
हर गम को, खुशियों से सजा देती है,
हर पल, साये की तरह, चलती है,
पूरी दुनिया में, माँ ही ऐसी होती है,

पहली गुजारिश, आखरी ख्वाहिश,
तू मेरे साथ रहे हरदम, बस एक फरमाइश,
तू साथ हो, तो हर राह आसान है,
मेरी हर खुशी, तुझसे शुरू, तुझ पर कुर्बान है,
माँ, हर बच्चो की जान है,
माँ, हर बच्चों का अभिमान है,
माँ, तेरे आँचल में, हर सुख है,
मेरा रंग, मेरी रूप में, तेरी छाँव, तेरी ही धूप है।

खुशबू कुमारी
मैथन डैम, धनबाद, झारखंड

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Khushboo kumari
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अपनी शब्दों से वफ़ा करती हूँ, एक कवि हूँ मैं, अपने परिचय को लफ़्ज़ों में... View full profile
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