तभी तो माँ बनाई है

ग़ज़ल – –

करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है।
तेरा दीदार नामुमकिन तभी तो मांँ बनाई है।।

बनाया है अगर वालिद को जन्नत का जो दरवाजा।
तो पैरों के तले मांँ के ये जन्नत भी बनाई है।।

कभी रातों में जब भी जाग कर मैं रोने लगता था।
तभी उठकर तुरत मांँ ने मुझे लोरी सुनाई है।।

मैं इतना खूबसूरत तो नही पर मांँ को लगता हूँ ।
हुआ बीमार तो कहती नज़र किसने लगाई है।।

मंगाई एक रोटी थी वो दो लेकर चली आई।
मेरी मांँ तो अभी तक भी न गिनती सीख पाई है।।

लगा कमजोर जो भाई माँ उसके पास जा बैठी।
मैं प्यारा था बहुत लेकिन वो उसके हिस्से आई है।।

बड़ी ही दूर रहता है “अनीश” उस शहरे मक्का से।
मुकम्मल हो गया अब हज, मेरी मांँ मुस्कराई है।।
—-अनीश शाह(8319681285)
सांईखेड़ा म. प्र.
———
दीदार=दर्शन। नामुमकिन =असंभव। वालिद=पिता। जन्नत=स्वर्ग। मुकक्मल=पूर्ण। हज= मक्का का तीर्थ।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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