वो माँ है

छोटी-छोटी बातों का रखती जो ध्यान
मोटी-मोटी बातों से रहती जो अनजान
नीचे धरती पे देखा जो इक भगवान
वो माँ है..वो माँ है..हाँ वो ही तो माँ है। वो माँ है

पलकों में रखती वो मेरी आँखों में सोती
निकले जो मेरे आँसू,मेरे नयनों से रोती
गोदी में खुशियां, आँचल दुनियां जहान
वो धरती..वो नदिया..वो ही आसमां है। वो माँ है

ममता की मूरत है या भगवान की सूरत
रहती सदा वो तत्पर,जब पड़ती जरूरत
सारी खुशियां करती अपनी जो बलिदान
वो जननी. वो दरिया. वो दया प्रतिमा है। वो माँ है

छोटे-छोटे निवालों से, ऊँचे-ऊँचे ख्यालों से
घर अंदर दीवारों से,बाहर दुनियावालों से
मुझको बचाके रखने को होती जो परेशान
वो देवी..वो करुणा…वो ही शील क्षमा है। वो मां है

काली रात अंधेरों में,शरत चंद्र उजालों में
घर-गलियारों में,मस्जिद और शिवालों में
दर-दर मांगे मन्नत, ख़ातिर अपने सन्तान
वो काली..वो दुर्गा..वो सीता.वो ही अम्मा है। वो माँ

©पंकज भूषण पाठक”प्रियम”
गिरिडीह, झारखंड

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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