माँ ही जन्नत

माँ
जिसे जुबां से पुकारने मे ही मिले राहत है ।
माँ जिसके चरणो मे ही है मिले जन्नत है ।
माँ ममता का जीता जागता स्वरूप है ।
माँ जग मे रब का ही दूसरा रूप है।
माँ भिन्न कुछ कहे सब जान जाती है ।
माँ हर दुआ बच्चो के लिए मांगती है ।
माँ जिसकी व्याख्या मे हर शब्द छोटा लगता है ।
माँ जिसके सामने सबका ही सिर झुकता है ।
माँ है तो आज हम सब ओर दूनिया है ।
माँ से ही तो हर मकान घर बनता है ।
माँ के पैर छू जब घर से कोई निकलता है ।
माँ के आशिर्वाद से सब काम बनता है।

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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