माँ

माँ
वो हर सुबह तुम्हारा
बिना अलार्म के उठ कर
किचन में खप जाना

वहीं से मुझे उठने के
लिए आवाज़ देना,

मेरी उनींदी आंखों
की मिन्नत कि
थोड़ी देर औऱ

कभी तुम्हारा
मान जाना
और कभी सख्ती से कहना
नही उठो, स्कूल बस आने वाली है।

फिर मुझे तैयार करने के बीच
प्रश्नों और हिदायतों की झड़ी।

होम वर्क की कॉपियां रखी कि नही?
टिफ़िन टाइम पर कर लेना

किसी से झगड़ना नही
और हां मन लगाकर पढ़ना!!!

मेरा कभी अनमना होकर और कभी
हल्के रोष में जवाब देना
हाँ, हाँ ,मैं कर लुंगी।
मैं कोई बच्ची नहीं हूँ।

मेरी बात सुनकर
तुम्हारा हल्का सा मुस्कुरा देना।

स्कूल बस से लौटते वक्त
तुम्हारा घर के सामने खड़ा होना
और बस से उतरते बच्चों की भीड़
में, मुझे नजरों से तलाशना।

फिर मेरे उतरते ही सवालों की बौछार,
कि आज स्कूल मे क्या हुआ?

मेरे सुनहरे बचपन का वो एक दिन

बार बार नजरों में आकर
ठहर जाता है।

और मेरी आँखों की नमी
तुमसे अक्सर शिकायत
करती है
कि तुमने
मुझे क्यूं बड़ा होने दिया ?

जानती हूँ ये सवाल बचकाना सा है।

पर इसे पूछने पर कई पीढ़ियों का बचपना लौट आता है

माँ!!!

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पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हूँ। अपने इर्द गिर्द जो कुछ देखता या महसूस करता हूँ...
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