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माँ से बाल सवाँ रे नही जाते

mehroz anwari

mehroz anwari

कविता

February 4, 2017

माँ से बाल अब सँवारे नही जाते
कोई तो समझाये इसे
जाने वाले कभी वापस नही आते
मन मे यही आस लिये है कहती
आकर कयो नही मुझे पुकारते।
यही सोच मे गुजा र दिये
कितने दिन और कितनी राते
यूहीँ तकि ये पे सर रख जागते ,जागते
मुझसे ऐसी क्या हुई गलती
जो तुम इतना हो तङपाते।
पागलो सी हो गयी मेरी दशा
तेरी हर बात दोहराते
क्या मिल रहा तुमहे मजा
फिरते हो जो चेहरा छुपा ते
धुधँली पङ गयी नैनो की ज्योति
याद मे आँसू बहाते बहाते।
आज यदि मै दु:ख हूँ सहती
कयो नही तुम मुझको हँसाते
मेरी सूनी माँग को कयो
तारो से तुम नही सँजाते
कयो शादी की सालगिरह पर
साथ हमा रे खुशी मनाते।
बिन श्रंगार के मै हूँ रहती
होठो पे लाली और बालों मे
कयो नही गजरा सजाते
आज अगर मै हूँ जीती
सिफ॔ बच्चो के वास्ते
जब भी तेरी मजार से है लौटते
अपने आपको असहाय है पाते ।
मेरे बच्चे मुझे बहला ते
मुझको है मजबूत बनाते
बनाने है अभी इनके खुशियों के रास्ते
रोशन कर नाम पिता जैसे दिये जगमगाते।

Author
mehroz anwari
नमस्कार, मेरा नाम मैहरोज़ अनवरी है। साहित्य पिडिया से जुङकर खुशी हुई बङे बङे साहित्य कारों की रचनाएँ प्रेरणादायक है। बेटी विषय पे कुछ लिखने को मिला साहित्य पिडिया को बहुत धन्यवाद करती हूँ।
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