Nov 10, 2018 · कविता
Reading time: 1 minute

माँ वेदों के बोल हैं

चले गये तुम छोड़ अकेला कैसे पीड़ा दर्द सहें अब,
निर्जन नीरव से जीवन में कैसे बिन तेरे रहें अब ?
सब कुछ मिल जाये इस जग में पर माता अनमोल है,
माँ ही ईश्वर माँ ही गुरु माँ माँ वेदों के बोल हैं ।

अपना शत सर्वस्व लुटाया घर परिवार बनाने में,
अपना हर सुख चैन तजी माँ आंगन-निलय सजाने में,
शब्द, वर्ण, इतिहास, व्याकरण, माँ ही तो भूगोल है,
माँ ही ईश्वर माँ ही गुरु माँ माँ वेदों के बोल हैं ।।

एक पहर में कर्म निरत माँ, दो पहर विश्राम के,
तीन पहर हरि गुण वांचे माँ शेष पहर अविराम से,
घड़ी-घड़ी में व्यस्त रहे माँ कहे काल का मोल है,
माँ ही ईश्वर माँ ही गुरु माँ माँ वेदों के बोल हैं ।

माँ के शुभ आशीष से हर बाधा छूमंतर होती है,
माँ की स्नेहदृष्टि से पीड़ा सुख में रूपांतर होती है,
माँ के वचनों को मानो नहीं जीवन डाँवा-डोल है,
माँ ही ईश्वर माँ ही गुरु माँ माँ वेदों के बोल हैं ।।

माँ के ही प्रताप से जग में ध्वज ममता की फहरी है,
माँ की ममता इस जगती में महासमुद्र से गहरी है,
इस ममता के आगे फीके महामंत्र के बोल हैं,
माँ ही ईश्वर माँ ही गुरु माँ माँ वेदों के बोल हैं ।

(पूर्णतया स्वरचित, मौलिक, एवं अप्रकाशित)
आनन्द बल्लभ
ग्राम व पोस्ट- कुणीधार, मानिला
जिला-अल्मोड़ा, उत्तराखंड- २६३६६७

Votes received: 400
54 Likes · 313 Comments · 3274 Views
लेखन के प्रति मेरा आत्मिक जुड़ाव है View full profile
You may also like: