Jan 10, 2017 · कविता
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माँ..मैं तेरी आत्मजा

माँ..मेरी आवाज तो सुनो
क्षण भर रुको..तुमसे दो बाते तो कर लूँ
इकबार तो सुन लो माँ
“मै हूँ तुम्हारी आत्मजा”

माँ दिल में तो दर्द बड़ी है
और छिपे सवाल कई है
क्या -क्या तुमसे पूछूँ माँ
सिर्फ इतना बता दो——-

कि क्या मै तुम्हारा अंश नही
मै तो थी तुम्हारे प्रेम की निशानी
मुझमे ही गढी थी..माँ तेरी प्रेम कहानी
मै तुम्हारे हर उस पल में थी
जो थी तुमपर खुशियाँ बरसाती

फिर कैसे ..
कैसे तुझपर बोझ बन गई माँ..मेरी ज़िन्दगानी
सिर्फ इतना बता दो माँ
क्या मुझमे नही पाया तूने अपनी छवि

खुद में ही दी थी तूने मुझे ये दुनियाँ
चाहती थी लुटाना मुझपर..अपनी हर एक खुशियाँ
फिर अचानक,
…अचानक ये क्या हुआ माँ
कि रह गई मैं बस “एक मांस का टूकड़ा”

वर्षो के इंतजार को फिर अपना बनाया
और मुझको ..यूँ पल में …कर दिया पराया
शायद तुम्हे चाहिए था..
अपने आँखो का तारा
पर अब ,
मुझे बस इतना बता दो माँ
क्या थी मेरी खता
कि हर बार,
हर बार तुम्हारे हाथों के स्पर्श से पहले
छुआ मुझे तुम्हारी नफ़रत ने
हर बार तुम्हारी ममता पर
भारी पड़ी तुम्हारी विवशता
हर बार दब के रह गई तुम्हारी आत्मा की आवाज———-
कि माँ,
मै थी तुम्हारी “आत्मजा”
#रितु राज

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