माँ मेरी देवी नहीं

माँ मेरी देवी नहीं – हार मांस की नारी है,
ये अलग बात है ,
वो जग से अलग – थोड़ी सी न्यारी है !

नास्तिक नहीं वो – फिर भी कर्म को ऊपर रखती है ,
रिश्तों में प्रेम प्रीत को – धर्म के ऊपर रखती है !

संघर्ष दिया जीवन ने उसको – हँस के सामना करती है ,
अपनों के सुख के खातिर – निज त्याग तपस्या करती है !

नल की दमयन्ती हो जैसे, हरिश्चंद्र की शैव्या जैसे ,
मोहन की नीलम बन – हँस के संघर्ष से खेला करती है !

उर में बहती प्रेम की गंगा, पर पाषाण बतलाती है
अपनी संतति को भी, हिय खोल नहीं दिखलाती है !

प्रेम-प्रीत चिल्लाने पे, बढ़-बढ़ हिय लगाने पे
झूठी आश जगाने पे, विस्वाश नही वो करती है !

कुम्हार कब माटी को, पुचकारता और सहलाता है
कूट-पीट के ही उसको, सुन्दर-सुघड़ बनता है !

ममता बांदी नही दिखावे की, चुपके से प्यार छलकती है
सूर्य किरण है – सौ पर्दों में भी, आभा अपनी बिखराती है !

मेरे बदन के हर कोने में जो, रज़ बन के इठलाती है
माँ है मेरी जो – जग से अलग, अजब, निराली है !

***
1 /11 /2018
[ मुग्धा सिद्धार्थ ]
भिलाई ( छत्तीसगढ़ )

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