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माँ भारती का गहना

पं.संजीव शुक्ल

पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

कविता

February 12, 2018

माँ भारती का गहना
————————–
क्यों ऐसे लड़ते हो यार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

हर दिन होती गोली-बारी
बेध रही है बज्र की छाती,
सीने पर गोली की वार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

तेरा भी कोई अपना होगा
तेरा भी कोई सपना होगा,
तुम भी तो किसी के सुकुमार
तुम्हे नहीं जीवन से प्यार।

सीमा पर अभी ठंढ बड़ी है
बादल भी और बर्फ घनी है,
जीवन तुम न जाना हार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

तुमको दुनिया वीर है कहती
तेरे भरोसे सुख से रहती
तू सहता दुश्मन का वार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

तुमको भी कोई प्यारी होगी
हृदय की पटरानी होगी,
वह करती होगी श्रृंगार
तुम्हे नहीं जीवन से प्यार।

तुम हो भारत माँ के गहने
वीर सपूत तेरे क्या कहने,
राष्ट्र तुम्हारा है परिवार
तुम्हे नहीं जीवन से प्यार।

सीमा पर तुम रोज ही लड़ते
गोली खा सीना पर मरते
तुम्हीं से राष्ट्र सलामत यार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

तेरे लिए नहीं होली-दीवाली
हस कर झेल रहा बमबारी,
युद्ध ही तेरा है त्यौहार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

जिस माँ ने तुझे जन्म दिया है
पाल पोस कर बड़ा किया है
उस जननी का वंदनवार
तुम्हे नहीं जीवन से प्यार।

एहसानमंद यह राष्ट्र तुम्हारा
सबको तुम प्राणों से प्यारा,
तुम पर राष्ट्र का रक्षा भार
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।

“सचिन”की आंखें लरज रही हैं
अश्रुधारा बरस रही है
तुम्हें करूँ सादर प्रणाम
तुम्हें नहीं जीवन से प्यार।
……
©®पं.संजीव शुक्ल “सचिन”
राष्ट्र के तमाम वीर सैनिकों को एवं सहादत प्राप्त महान आत्माओं को समर्पित।

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Author
पं.संजीव शुक्ल
From: नरकटियागंज (प.चम्पारण)
D/O/B- 07/01/1976 मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।
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