कविता · Reading time: 1 minute

माँ- बाप

बनकर मां – बाप , मां – बाप को जाना।
ममता प्यार और स्नेह को हमने पहचाना ।।
लोग कहते हैं हु मैं अपनी मां की परछाई ।
परछाई छोड़ दे कैसे साथ शरीर का ।
ना है वजूद परछाई के बिना शरीर का।
बनकर मां-बाप ये हमने आज जाना।

मां बाप के रिश्ते से बढ़ा ना है कोई रिश्ता।
है जितना सरल निभाना इसे , है उतना कठिन निभाना इसे।
बनकर मां-बाप ये हमने आज जाना।।
होता पिता वही जिसकी आंखों में आंसू होठों पर हंसी ।
बिटिया की विदाई के समय करता है ।
जो अपने दिल के हर टुकड़े को विदा ।।
बनकर मां -बाप ये हमने आज जाना ।

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